किसका मिटता हुआ आकार लिए फिरती है
ख़ामुशी कौन सा अवतार लिए फिरती है
ख़ामुशी कौन सा अवतार लिए फिरती है
लौट जाती हैं ख़लाओं में सुनहरी किरणें
रौशनी इक शबे-बेदार लिए फिरती है
शोर को काटता रहता है सुकूते-सहरा
भीड़ तन्हाई की तलवार लिए फिरती है
ज़र्द चेहरों में नज़र आती है धानी सिलवट
ये ख़िज़ाँ मौसमे-गुलज़ार लिए फिरती है
चार-दीवारी से बाहर नहीं आ पाता हूँ
मेरी आवारगी घर-बार लिए फिरती है
आदमी बुझता चला जाता है धीरे धीरे
'सबको दुनिया की हवस ख़्वार लिए फिरती है'
ख़ुद ब ख़ुद नर्मरौ हो जाता है मुझमें दरिया
एक कश्ती मेरी मझधार लिए फिरती है
ख़ून से मेरे चरागों को जलाती है 'दिनेश'
शबे-ग़म सुबह के आज़ार लिए फिरती है
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