दो-चार शेर क़ाबिले-इरशाद हो गए
अच्छा 'दिनेश' आप भी उस्ताद हो गए
अच्छा 'दिनेश' आप भी उस्ताद हो गए
दुनिया की बेड़ियों में गिरफ़्तार ठीक हैं
खुश हैं तुम्हारी क़ैद से आज़ाद हो गए
वो रात बेक़रानी में बुझती चली गई
हम ख़ाब-ख़ाब लोग भी शबज़ाद हो गए
क़ुदरत हमारे सामने ईजाद हो गई
हम चाक पर रखे-रखे बर्बाद हो गए
यकसानियत में डूबती जाती है ज़िन्दगी
हम अपनी दास्तान से नाशाद हो गए
आँखों को अपनी दश्त का दरिया बना लिया
हम घर में बैठे-बैठे ही फ़रहाद हो गए
जब क़द में बाप से बड़ी औलाद हो गई
तो घर में फ़ासले नए ईजाद हो गए
दुनिया ने इतनी बार दिए मशवरे हमें
थक हार के हम अपने ही नक़्क़ाद हो गए
होने लगी है साहिबो महफ़िल में वाह-वाह
अशआर मेरे लज़्ज़ते-फ़रियाद हो गए
कोई तो बात होगी हमारे बयान में
जो शेर मुँह-ज़बानी तुम्हें याद हो गए
तब्दील करने आये थे तरक़ीब तुम 'दिनेश'
ये क्या ज़रा सी दाद से मुन्क़ाद हो गए
दिनेश नायडू
No comments:
Post a Comment