वक़्त ने कैसे तिलिस्मात किए
जितने भी दिन थे मेरे रात किए
जितने भी दिन थे मेरे रात किए
ज़िन्दगी ! हाल सुनाओ अपना
एक मुद्दत हुई है बात किए
ख़ोखला हो गया हूँ पूरा मैं
तुमने घायल मेरे जज़्बात किए
क्या कभी आएगी वो बादे-सबा
कितने सावन हुए बरसात किए
जाने किस धुन में गँवा दी दुनिया
फिर भी यारों नशे दिन-रात किए
हम भटकते है तेरे सहरा में
दश्ते-तन्हाई को हमज़ात किए
दिनेश नायडू
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