कुछ इस तरह भी मेरी आरज़ी ख़ुशी टूटी
कि जैसे गिर के कोई चीज़ कॉंच की टूटी
कि जैसे गिर के कोई चीज़ कॉंच की टूटी
गिला करूँ भी मैं किससे हयात बुझने का
फिसल के मेरे ही हाथों से रोशनी टूटी
अज़ल से ही कहीं मुझमें दरार थी पिन्हाँ
बस एक चोट लगी और ज़िन्दगी टूटी
उसी के वास्ते रिश्ता बनाये रक्खा था
चला गया तो मेरी ख़ुद से दोस्ती टूटी
सितारे टूट गए मेरे कहकशां से फिर
बिखरते चाँद के टुकड़ों से चांदनी टूटी
तमाम लफ्ज़ बिगड़ने लगे बनाने से
जो मैंने जोड़ा ज़ियादा तो शाइरी टूटी
मुझे ये देख के बोला मेरे मसीहा ने
तुम्हारी ज़ात है प्यारे सौ फ़ीसदी टूटी
बहुत चमक रही थी दूर से मेरी दुनिया
जब उसके पास गया तो मुझे मिली टूटी
तेरा ग़ुलाम कभी हो सकेगा क्या आज़ाद
भटक रहा हूँ पहन कर मैं हथकड़ी टूटी
मुझे वो तोड़ के ख़ुद को बना रही थी 'दिनेश'
वो मेरे सामने लगता है ज़ाहिरी टूटी
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