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Tuesday, April 15, 2025

बिखरते चाँद के टुकड़ों से चांदनी टूटी

 कुछ इस तरह भी मेरी आरज़ी ख़ुशी टूटी 
कि जैसे गिर के कोई चीज़ कॉंच की टूटी 

गिला करूँ भी मैं किससे हयात बुझने का 
फिसल के मेरे ही हाथों से रोशनी टूटी 

अज़ल से ही कहीं मुझमें दरार थी पिन्हाँ 
बस एक चोट लगी और ज़िन्दगी टूटी

उसी के वास्ते रिश्ता बनाये रक्खा था 
चला गया तो मेरी ख़ुद से दोस्ती टूटी

सितारे टूट गए मेरे कहकशां से फिर 
बिखरते चाँद के टुकड़ों से चांदनी टूटी

तमाम लफ्ज़ बिगड़ने लगे बनाने से  
जो मैंने जोड़ा ज़ियादा तो शाइरी टूटी 

मुझे ये देख के बोला मेरे मसीहा ने
तुम्हारी ज़ात है प्यारे सौ फ़ीसदी टूटी

बहुत चमक रही थी दूर से मेरी दुनिया 
जब उसके पास गया तो मुझे मिली टूटी 
 
तेरा ग़ुलाम कभी हो सकेगा क्या आज़ाद 
भटक रहा हूँ पहन कर मैं हथकड़ी टूटी  

मुझे वो तोड़ के ख़ुद को बना रही थी 'दिनेश'
वो मेरे सामने लगता है ज़ाहिरी टूटी

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