आँखों में सर्द रात बिठाने की देर थी
बस आख़िरी चराग़ बुझाने की देर थी
बस आख़िरी चराग़ बुझाने की देर थी
हमको दिखाई देने लगी पूरी कायनात
अपने जहाँ को सिफ़्र बनाने की देर थी
फिर शह्र सूखे पत्ते के मानिंद जल उठा
बस इक ज़रा सी आग लगाने की देर थी
हर कश के साथ शेर में ढलते गए ख़याल
सिगरट को आँसुओं से जलाने की देर थी
दिल टूट के बिखरता गया मेरे सामने
प्यारे! ग़ज़ल की शाख हिलाने की देर थी
अब ज़िन्दगी सलाह भी देने लगी है तू
कुछ वक़्त मेरे साथ बिताने की देर थी
अहले-अदब तमाम नज़र आ गए हमें
अफवाह सिर्फ़ एक उड़ाने की देर थी
मुझको समझ में आ गया दुनिया का एहतिमाम
बस खाक़ में बदन को मिलाने की देर थी
दिनेश नायडू
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