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Sunday, April 13, 2025

शहर में अपने ठिकाने नहीं हो पाए कभी

उसके आने के ज़माने नहीं हो पाए कभी 
हमसे जीने के बहाने नहीं हो पाए कभी
 
बेरुख़ी से तेरी छतनार शजर सूख गए  
हम नए लोग पुराने नहीं हो पाये कभी

अपने ख़ेमे की हिफाज़त में लगे रहते हैं
यार ये लोग घराने नहीं हो पाए कभी 

वो किसी ख़ाब के मानिंद सजा रहता है 
हम हक़ीक़त से फ़साने नहीं हो पाए कभी

थकते जब हैं तो सड़क ओढ़ के सो जाते हैं 
शहर में अपने ठिकाने नहीं हो पाए कभी
 
शेर दर शेर तुझे नज़्म तो हम करते रहे 
जमअ पर तेरे ख़ज़ाने नहीं हो पाए कभी 

थाम तो हाथ लिया पोंछे भी आंसू मेरे
पर जहां रो ले वो शाने नहीं हो पाए कभी 

फिर कोई अपना ही आयेगा हमारी ज़द में 
हमसे औरों पे निशाने नहीं हो पाये कभी

तेरे आने से भी अब लगता है बदलेंगे नहीं 
दिल के मौसम जो सुहाने नहीं हो पाए कभी 

घर की दहलीज़ कभी पार नहीं कर पाये 
हम से आशिक़ तो दिवाने नहीं हो पाए कभी

अपनी ग़लती को छुपाने की नहीं की कोशिश
हम 'दिनेश' इतने सियाने नहीं हो पाए कभी

दिनेश नायडू 

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