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Saturday, March 15, 2025

सहीह बात भी कहकर हमें पलटना पड़ा

तमाम उम्र हमें रौशनी में खटना पड़ा
फिर एक रोज़ किसी रात में सिमटना पड़ा 

घना हो पेड़ तो शाख़ों को छाँट देते हैं 
दरार से हमें घर तोड़ कर निपटना पड़ा

जुनूँ का रास्ता ऐसे नहीं निकलता है
हमें पहाड़ के सीने में जा के फटना पड़ा

शुरूअ दौर में क्या दोस्ती हमारी थी
समय के साथ मुझे ज़िन्दगी से कटना पड़ा

ख़िरद की नाव तो सूराख़ वाली होती है
बचानी जां थी उसे आख़िरश उलटना पड़ा

बहाव तेज़ हो तो बाँध खोल देते हैं 
हमें भी आंसुओं के रास्ते से हटना पड़ा 

कहाँ ज़माने के मेयार को बदल पाए 
ज़रा ज़रा सा हमें रोज़ रोज़ घटना पड़ा 

तुम्हारे झूठ भी सच मानती रही दुनिया 
सहीह बात भी कहकर हमें पलटना पड़ा

जला रही थी कड़ी धूप सर्द यादों की 
ग़ज़ल की छाँव से आ कर हमें लिपटना पड़ा

ये शेरियत ये ग़ज़लगोई यूँ नहीं आती
न जाने कितने दिनों ज़ात में सिमटना पड़ा

ख़ला की छान-फटक करते रहना पड़ता है 
कोई भी दश्त हमें साहिबो! निकट न पड़ा

दिनेश नायडू

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