तमाम उम्र हमें रौशनी में खटना पड़ा
फिर एक रोज़ किसी रात में सिमटना पड़ा
घना हो पेड़ तो शाख़ों को छाँट देते हैं
दरार से हमें घर तोड़ कर निपटना पड़ा
जुनूँ का रास्ता ऐसे नहीं निकलता है
हमें पहाड़ के सीने में जा के फटना पड़ा
शुरूअ दौर में क्या दोस्ती हमारी थी
समय के साथ मुझे ज़िन्दगी से कटना पड़ा
ख़िरद की नाव तो सूराख़ वाली होती है
बचानी जां थी उसे आख़िरश उलटना पड़ा
बहाव तेज़ हो तो बाँध खोल देते हैं
हमें भी आंसुओं के रास्ते से हटना पड़ा
कहाँ ज़माने के मेयार को बदल पाए
ज़रा ज़रा सा हमें रोज़ रोज़ घटना पड़ा
तुम्हारे झूठ भी सच मानती रही दुनिया
सहीह बात भी कहकर हमें पलटना पड़ा
जला रही थी कड़ी धूप सर्द यादों की
ग़ज़ल की छाँव से आ कर हमें लिपटना पड़ा
ये शेरियत ये ग़ज़लगोई यूँ नहीं आती
न जाने कितने दिनों ज़ात में सिमटना पड़ा
ख़ला की छान-फटक करते रहना पड़ता है
कोई भी दश्त हमें साहिबो! निकट न पड़ा
दिनेश नायडू
फिर एक रोज़ किसी रात में सिमटना पड़ा
घना हो पेड़ तो शाख़ों को छाँट देते हैं
दरार से हमें घर तोड़ कर निपटना पड़ा
जुनूँ का रास्ता ऐसे नहीं निकलता है
हमें पहाड़ के सीने में जा के फटना पड़ा
शुरूअ दौर में क्या दोस्ती हमारी थी
समय के साथ मुझे ज़िन्दगी से कटना पड़ा
ख़िरद की नाव तो सूराख़ वाली होती है
बचानी जां थी उसे आख़िरश उलटना पड़ा
बहाव तेज़ हो तो बाँध खोल देते हैं
हमें भी आंसुओं के रास्ते से हटना पड़ा
कहाँ ज़माने के मेयार को बदल पाए
ज़रा ज़रा सा हमें रोज़ रोज़ घटना पड़ा
तुम्हारे झूठ भी सच मानती रही दुनिया
सहीह बात भी कहकर हमें पलटना पड़ा
जला रही थी कड़ी धूप सर्द यादों की
ग़ज़ल की छाँव से आ कर हमें लिपटना पड़ा
ये शेरियत ये ग़ज़लगोई यूँ नहीं आती
न जाने कितने दिनों ज़ात में सिमटना पड़ा
ख़ला की छान-फटक करते रहना पड़ता है
कोई भी दश्त हमें साहिबो! निकट न पड़ा
दिनेश नायडू
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