ज़िंदगी ज़िंदगी नहीं होती
इन दिनों शाइरी नहीं होती
इन दिनों शाइरी नहीं होती
मुझमें ठहरी है इक अँधेरी रात
जो कभी चांदनी नहीं होती
काश दुनिया को देख पाते हम
काश उसकी गली नहीं होती
सिर्फ़ जादूगरी है आँखों की
रौशनी रौशनी नहीं होती
क़ैद रहता हूँ अपने जंगल में
मुझसे आवारगी नहीं होती
जिस्म में लौटना ही पड़ता है
बेख़ुदी दाइमी नहीं होती
कोई हँसता है कोई रोता है
जिंदगी एक सी नहीं होती
और तो कोई दुःख नहीं होता
इतना दुःख है, ख़ुशी नहीं होती
दिनेश नायडू
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