आँसू में नहाई हुई गुलगून ग़ज़ल कह
ज़ख्मों प चलाते हुए नाख़ून ग़ज़ल कह
ख़ामोश ही रह जाएगा क्या फिर से नया साल
हो जाय न ये मार्च मई-जून ग़ज़ल कह
उलझा हुआ है रेशमी धागों में तेरा ज़ह्न
अब फाड़ दे ख़ामोशी का कोकून ग़ज़ल कह
घटता नहीं है प्यारे कभी ग़म का खज़ाना
क्यों दिल को बना रक्खा है कारून, ग़ज़ल कह
दिन भर तो उदासी का सिरा ढूंढ रहा था
अब शाम भी होने लगी मैरून, ग़ज़ल कह
छूने तुझे आ जायेगी वो बादे-बहारी
इक बार ख़िज़ाँ में कोई ज़रयून ग़ज़ल कह
दुनिया में कहीं हुस्ने-तख़य्युल नहीं मिलता
ग़ज़लों सी कोई होती है ख़ातून, ग़ज़ल कह
दिल बैठ भी सकता था अगर शेर न कहता
नासेह ने पुकारा था मुझे, तू न ग़ज़ल कह
मुमकिन है मुझे फ़तह मिले लफ़्ज़ में छप जाऊं
इस बार तो मारूंगा मैं शब-ख़ून ग़ज़ल कह
कल गै'लरी में दिख गई तस्वीर पुरानी,
तब से मुझे कहने लगा है फून, ग़ज़ल कह
सोचा न था वो मुझको कभी कॉल करेगा
मुझसे यही कहने को किया फून, ग़ज़ल कह
आवाज़ के पीछे भी इक आवाज़ थी शायद
इक कांपती टूटी हुई सी टोन... ग़ज़ल कह
अब बेचता है कौन नहीं दर्द का सामान
घर में तुझे भरनी है न परचून, ग़ज़ल कह
जो चाँद कभी छत पे मुकम्मल नहीं दिखता
उसको बना के शेर का फुल मून, ग़ज़ल कह
इरशाद भी करता है तुझे कूचा ए जानाँ
दिल आ तो गया है तेरा रंगून, ग़ज़ल कह
मौक़ा है दिनेश आज अयाँ कर दे दिल अपना
टूटे तो तेरे ज़ब्त का क़ानून, ग़ज़ल कह
दिनेश नायडू
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