कि दिल सा झूठा कोई दास्तानगो नहीं है
मैं अपने पास रखी चीज़ें भूल जाता हूँ
उसी को ढूंढने लगता हूँ पास जो नहीं है
बस एक बूँद ही काफ़ी है आग देने को
अब आँसुओं की ज़रूरत अलाव को नहीं है
सितारे टाँकती रहती हैं झील में पलकें
सियाह शब से नज़र नाउमीद तो नहीं है
सराब बनते ही रहते हैं दिल के सहरा में
अगरचे सामने चेहरा है, मान लो नहीं है
हमारी जान चली जायेगी इस उलझन में
अगर नहीं है मुहब्बत तो बोल दो नहीं है
वो इतना खुल के नहीं मिलता था कभी पहले
मुझे लगा था वो शायद उदास हो, नहीं है
दिनेश कैसे ख़राबों में तुम भटकते हो
कहीं ये राहे-सुख़न राहे-हश्र तो नहीं है
दिनेश नायडू
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