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Monday, February 24, 2025

कोई सफ़ेद सी-गल नाव-नाव बोलता है

क़दम क़दम पे लहू का दबाव बोलता है
मैं कितनी पीता हूँ सिग'रट, चढ़ाव बोलता है

किनारे वाले हरिक गाँव में है सन्नाटा
ख़मोश हो के नदी का बहाव बोलता है

मैं अपने जिस्म के अंदर सिमट के बैठा हूँ
मेरा मसीहा बचाओ बचाव बोलता है

कुछ इसलिए भी बहुत चलती है दुकान उसकी
हर एक चीज़ का वो दुगना भाव बोलता है

ख़मोशियों में ख़लल डालने को सागर की
कोई सफ़ेद सी-गल नाव-नाव बोलता है

अजीब किस्म की ठंडक है आपके घर में
कभी कभी हमें घर का अलाव बोलता है

बदन को छू के ज़रा छेड़ दो किसी लय में
अजब सुरों में बदन का खिंचाव बोलता है

दिनेश नायडू 

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