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Wednesday, February 26, 2025

मैं हूँ इक शख़्स के हाथों का बनाया हुआ शख़्स

 मुस्तकिल साज़िशे-दौराँ का सताया हुआ शख़्स 
था कभी अपने ही कुनबे का, पराया हुआ शख़्स 

ऐसी किस्मत है कि उससे भी जुदा होना पड़ा 
मेरी किस्मत में जो था लिक्खा लिखाया हुआ शख़्स
 
मेरी मिट्टी भले भगवान ने गूँथी होगी 
मैं हूँ इक शख़्स के हाथों का बनाया हुआ शख़्स  

रेत जैसा मेरी मुट्ठी से फिसल जाता है 
हाथ आयेगा कभी हाथ न आया हुआ शख़्स

जाने क्या देखती रहती है नदी की जानिब
कौन था उसका वो गंगा में बहाया हुआ शख़्स

रखने आया है मेरी ग़ज़लों पे तनक़ीदी नज़र 
उनकी महफ़िल में रक़ीबों का बिठाया हुआ शख़्स 

घर की बुनियाद उसी शख़्स ने रक्खी थी कभी 
घर के कोने में जो रहता है भुलाया हुआ शख़्स 
 
अब मुझे चाह के भी नींद नहीं आती है 
मैं हूँ बिखरे हुए ख़ाबों का जगाया हुआ शख़्स
 
जब चराग़ों को कुरेदा तो अंधेरा निकला
कितना टूटा हुआ है आस लगाया हुआ शख़्स 

देख ले, साहिबे-आलम है तेरे सहरा का !
ये तेरा बेसरो-सामान बुलाया हुआ शख़्स

दिनेश नायडू

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