कब से वही मंजर है कुछ बदला हुआ दिखता नहीं
मेरे सफ़र में अब पड़ाव आता हुआ दिखता नहीं
ऐसा घना कुहरा मेरी आँखों में आ कर जम गया
ये दो क़दम का फ़ासला मिटता हुआ दिखता नहीं
ये दो क़दम का फ़ासला मिटता हुआ दिखता नहीं
जब देखते हैं ख़ाब की ऐनक हटा कर आस पास
जो भी था हमने उम्र भर देखा हुआ दिखता नहीं
जो भी था हमने उम्र भर देखा हुआ दिखता नहीं
मुझको यकीं है दूध की नदियाँ निकल आती मगर
फ़रहाद से कुहसार अब टुकड़ा हुआ दिखता नहीं
फ़रहाद से कुहसार अब टुकड़ा हुआ दिखता नहीं
दुनिया हकीकत और भरम का इक तिलिस्मी खेल है
जो था बज़ाहिर सामने होना, हुआ दिखता नहीं
जो था बज़ाहिर सामने होना, हुआ दिखता नहीं
शायद मुसलसल हार ही है ज़िन्दगी का मारका
इस जंग में हमको कोई लड़ता हुआ दिखता नहीं
फिर क्यों न अब कश्ती को मौजों के सहारे छोड़ दें
ऐसे भी अपनी चाह का होता हुआ दिखता नहीं
इस जंग में हमको कोई लड़ता हुआ दिखता नहीं
फिर क्यों न अब कश्ती को मौजों के सहारे छोड़ दें
ऐसे भी अपनी चाह का होता हुआ दिखता नहीं
हम ढूंढते रहते है अपने ध्यान में उसका निशां
लेकिन कहीं चेहरा कोई बनता हुआ दिखता नहीं
लेकिन कहीं चेहरा कोई बनता हुआ दिखता नहीं
मेरे फ़सानों के मआनी पूछते रहते हो तुम
इक दिल पड़ा है टूट के बिखरा हुआ, दिखता नहीं
इक दिल पड़ा है टूट के बिखरा हुआ, दिखता नहीं
हमको पता हैं क़ायदे क़ानून सब तहज़ीब के
फिर भी लकीरों में है जो लिक्खा हुआ दिखता नहीं
फिर भी लकीरों में है जो लिक्खा हुआ दिखता नहीं
हमसे "दिनेश" आशिक कई दिखते हैं उसके शह्र में
बस एक लड़का हिज्र का मारा हुआ दिखता नहीं
बस एक लड़का हिज्र का मारा हुआ दिखता नहीं
दिनेश नायडू
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