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Sunday, January 19, 2025

उसके बदन की धूप ने उजला किया मुझे

पहले तो उसकी याद ने तनहा किया मुझे
फिर रफ़्ता रफ़्ता और भी उसका किया मुझे 

मैं इक उदास शहर की मायूस रात था
उसके बदन की धूप ने उजला किया मुझे

मैंने तो उसके ख़ाब में काटी है ज़िन्दगी
फिर कैसे उसके लम्स ने तनहा किया मुझे

मिटते चले गये मेरी दुनिया से मेरे नक्श
तेरी तलब ने हू ब हू  तुझसा किया मुझे

मैंने भी उसका नाम सभी को बता दिया 
यारो! उदास शाम ने जब वा किया मुझे

मुझ पर जुनूँ सवार था प्यारे सुखन की शाम
ग़ज़लों के इंतिख़ाब ने रुस्वा किया मुझे

मैं दर ब दर भटकता रहा उसकी खोज में
दरिया की जुस्तजू ने ही सहरा किया मुझे

कैसे तमाम शहरों में आऊंगा मैं दिनेश
गोया! हर एक शख्स पुकारा किया मुझे

दिनेश नायडू 

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