दरिया का रोम-रोम दुआ में लगा रहा
इतना किसी का शहर में चर्चा न हो कभी
हर एक शख़्स सौतो-सदा में लगा रहा
इक रूह तैरती रही दो आलमों के बीच
इक जिस्म मिटते मिटते निदा में लगा रहा
उसकी गली पे होश की सरहद हुई तमाम
ध्यान अपना सिर्फ़ अपने ख़ुदा में लगा रहा
वो बदगुमां है होता रहे थी ख़िरद की सोच
दिल सबसे बेनियाज़ सदा में लगा रहा
वो था लहू कि रंग किसी को ख़बर न थी
कुछ सुर्ख़-सुर्ख़ दस्ते-हिना में लगा रहा
रोता रहा वो मुझसे लिपट कर तमाम रात
‘मैं उसके साथ साथ दुआ में लगा रहा’
कल की उदास शाम बड़ी मौज में कटी
मन दिल-खंडर की ठंडी हवा में लगा रहा
कल सिसकियों से सारी फ़ज़ा गूंजती रही
वो कौन था जो आहो-बुका में लगा रहा
उससे बिछड़ के मौत तो आना ही थी ‘दिनेश’
दिल यूँ भी लम्हा-लम्हा फ़ना में लगा रहा
दिनेश नायडू
Kya kahne Dinesh bhai.waah
ReplyDeleteShukria Gaurav Bhai :)
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