उसकी यादों ने भी क्या क्या कर दिया
मुझपे हावी हो गया गहरा सुकूत
इक सदा ने काम अपना कर दिया
इस तरह और टूट कर रोता रहूँ ?
किसकी दस्तक ने मुझे वा कर दिया
वो भी उलझे रह गए घर-बार में
हमने भी सहरा को सहरा कर दिया
चीख़ उट्ठी शहर की वीरानियाँ
आह ने मेरी छनाका कर दिया
अब सराबों की तरफ़ जाएंगे हम
हमको दरियाओं ने प्यासा कर दिया
क्या हुआ, वो शक्ल क्या देखी गयी ?
रौशनी ने मुझको अंधा कर दिया
खुद ब खुद ही ज़ख्म भर जाता मेरा
इस रफ़ू ने ज़ख़्म गहरा कर दिया
अब हवाएं तय करें क्या हो मिरा ?
मैंने अपना ख़ाक उड़ाना कर दिया
दिनेश नायडू
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