मेरी आँखों से भभूके पे भभूका निकला
अश्क में भीगते रहने से मिला क्या मुझको
मेरे दामन से कहाँ रंग लहू का निकला
लौट आता हूँ इसी दश्त में चलते चलते
जाने कैसा ये अजब खेल भी ख़ू का निकला
ज़िन्दगी मौत की दहशत में गंवा दी मैंने
आख़िरी नाम भी निकला तो अदू का निकला
हिज्र की रात थी छाले उभर आये मेरे
गोया मौसम कोई जलती हुई लू का निकला
दिनेश नायडू
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