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Friday, April 17, 2020

मेरे दामन से कहाँ रंग लहू का निकला


अश्क का रंग भी इक रंग लहू का निकला
मेरी आँखों से भभूके पे भभूका निकला

अश्क में भीगते रहने से मिला क्या मुझको
मेरे दामन से कहाँ रंग लहू का निकला

लौट आता हूँ इसी दश्त में चलते चलते
जाने कैसा ये अजब खेल भी ख़ू का निकला

ज़िन्दगी मौत की दहशत में गंवा दी मैंने
आख़िरी नाम भी निकला तो अदू का निकला

हिज्र की रात थी छाले उभर आये मेरे
गोया मौसम कोई जलती हुई लू का निकला

दिनेश नायडू

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