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Friday, April 17, 2020

अब तो आँखों से मेरी रंग हिना का निकले


जो भी निकले तिरी आवाज़ लगाता निकले
ऐसे हालात में अब घर से कोई क्या निकले

उसके लहजे में सराबों की अजब रौनक है
ऐन मुमकिन है वो तपता हुआ सहरा निकले

हर तरफ़ खाब, वही खाब, वही इक चेहरा
अब किसी तौर मेरे घर से ये मलबा निकले

दश्त वालों को बताओ की यहाँ मैं भी हूँ
क्या पता मुझसे ही उनका कोई रस्ता निकले

बस इसी आस में बैठा हूँ सरे सहरा मैं
कोई बादल मुझे आवाज़ लगाता निकले

चाँद तो खैर तेरा अक्स है परछाई है
अब तो सूरज भी तेरी याद दिलाता निकले

काश ऐसा हो तेरे शह्र मैं प्यासा आउँ,
और तेरे कदमों से हो कर कोई दरिया निकले

रक्स करते थे तेरे हाथों पे कितने आलम
अब तो आँखों से मेरी रंग हिना का निकले

तेरे होने पे भी इक डर सा लगा रहता है
कैसे इस जी से तेरे हिज्र का धड़का निकले

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