ऐसे हालात में अब घर से कोई क्या निकले
उसके लहजे में सराबों की अजब रौनक है
ऐन मुमकिन है वो तपता हुआ सहरा निकले
हर तरफ़ खाब, वही खाब, वही इक चेहरा
अब किसी तौर मेरे घर से ये मलबा निकले
दश्त वालों को बताओ की यहाँ मैं भी हूँ
क्या पता मुझसे ही उनका कोई रस्ता निकले
बस इसी आस में बैठा हूँ सरे सहरा मैं
कोई बादल मुझे आवाज़ लगाता निकले
चाँद तो खैर तेरा अक्स है परछाई है
अब तो सूरज भी तेरी याद दिलाता निकले
काश ऐसा हो तेरे शह्र मैं प्यासा आउँ,
और तेरे कदमों से हो कर कोई दरिया निकले
रक्स करते थे तेरे हाथों पे कितने आलम
अब तो आँखों से मेरी रंग हिना का निकले
तेरे होने पे भी इक डर सा लगा रहता है
कैसे इस जी से तेरे हिज्र का धड़का निकले
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