फिर भी शब फूल बन कर महकती हुई वज्ह यादों की नन्ही सीं कुछ तितलियाँ
बर्फ़बारी के झक्कड़ गरजते हुए सब्ज़ मौसम की यादें कुचलते हुए
गुज़रे मौसम का पैग़ाम लाता रहा जलती-बुझती हुईं सिगरटों का धुआँ
मेरे घर के दरीचे पे जलता हुआ एक तनहा अकेला दिया आस का
उसके आने की उम्मीद करती हुईं मेरे कमरे की कुछ अधखुली खिड़कियाँ
दश्त की सरहदों पे उभरने लगा एक चेहरा किसी जानने वाले का
कोई आवाज़ मुझको बुलाने लगी फिर सदा से महकने लगीं वादियाँ
वो जो आवाज़ के दश्त में खो गया वो हमारी ख़मोशी का इक देस था
अब मैं अपनी कहानी सुनाता नहीं, कोई मेरी कहानी भी सुनता कहाँ ?
शहर भर की उदासी समेटे हुए पार्क के कोने में एक ही बेंच है
जिसकी आग़ोश में मेरी सिगरट का कश रोज़ लेती है बेहाल तन्हाइयाँ
मैं तो सहरा की उड़ती हुई गर्द को अपनी आँखों में भरने लगा हार कर
अब मुझे राह कोई नहीं ढूंढ़नी अब नहीं जानना तेरा घर है कहाँ
दिनेश नायडू
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