जागता हूँ तो इन आँखों में नमी रहती है
ढूंढ़ता रहता हूँ बेसुध मैं किसी माचिस को
एक सिगरट मिरे होठों से लगी रहती है
तू कोई और ही होता गया मैं देखा किया
अब तेरे होने पे भी तेरी कमी रहती है
एक तस्वीर सलीक़े से रखी है घर में
बाक़ी हर चीज़ तो बस यूँ ही पड़ी रहती है
ऐसे आलम में जहां कोई नहीं कहता कुछ
ये सदाओं की फ़ज़ा कैसे बनी रहती है
ढलता जाता हूँ अंधेरों में मैं रफ़्ता-रफ़्ता
चांदनी दूर कहीं, दूर खड़ी रहती है
टिमटिमाते हैं दिए मुझमें तिरी यादों के
मेरी पूरी ही फ़ज़ा शेष बुझी रहती है
मैं तिरे पास ख़लाओं में पहुँच जाता हूँ
और इक लाश कहीं घर में पड़ी रहती है
दिनेश नायडू
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