बर्बादी का जी हल्का हो जाता है
जब घिरता है तेरी यादों का कुहरा
पूरा मंज़र बर्फ़ीला हो जाता है
क्या पाऊंगा उससे शिकवा करने से
शिकवा करने से भी क्या हो जाता है
इतना है मेरी तन्हाई की फैलाव
पूरा सहरा इक ज़र्रा हो जाता है
बढ़ता जाता है ये ग़म रफ़्ता-रफ़्ता
मुझ पर हावी सन्नाटा हो जाता है
तकता रहता हूँ उजली राहें दिन भर
धीरे धीरे सब काला हो जाता है
जब भी चर्चा होता है इक रिश्ते का
मेरा सारा मन खट्टा हो जाता है
पर्वत रह जाता है प्यासा का प्यासा
बर्फ़ पिघलती है झरना हो जाता है
जो सबकी आँखों में चुभता है वो ग़म
मेरी आँखों का तारा हो जाता है
मेरे सीने में है पारस ग़ज़लों का
मुझमें आ कर दुःख सोना हो जाता है
जीता रहता हूँ अपनी मर्ज़ी से मैं
जैसा होना है वैसा हो जाता है
उसको साहिल की राहत मंज़ूर नहीं
जिसका मौजों से रिश्ता हो जाता है
दिनेश नायडू
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