मैं मुद्दत से ठहरा हूँ मंझधार में
नये फूल आये हैं गुलज़ार में
नये फूल आयेंगे बाज़ार में
जो बिल्कुल कहानी से वाक़िफ़ न था
वही फिर भी डूबा था किरदार में
मुझे दश्तो-सहरा भटकना पड़ा
वो उलझा रहा अपने घर-बार में
नहीं डबडबायी कभी मेरी आंख
मैं रोया तो बस अपने अशआर में
उसे मेरी परवा ज़रा भी न थी
मैं उलझा रहा ख़ुद से बेकार में
कहो उससे अब वो न लौटे यहां
बहुत ख़ुश हूँ मैं अपने संसार में
उदासी से कल शब हुई गुफ़्तगू
तिरा ज़िक्र आया था गुफ़्तार में
नदी सर पटकती रही बाँध पर
नहीं राह मिल पाई दीवार में
दिनेश नायडू
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