Translate

Friday, April 17, 2020

देख पाता मैं आइना कब तक


वहशतें होंगी रहनुमा कब तक
काम आयेगी ये दवा कब तक

आहटें सुन रहा था ख़लवत में
जाने फिर सोचता रहा कब तक

सर्द रातों का बर्फ़ सन्नाटा
ज़हन में गूंजता रहा कब तक

पास हो इसलिये तो पूछा है
दरमियाँ होगा फ़ासला कब तक

सिलवटें वक़्त की नज़र आयीं
देख पाता मैं आइना कब तक

कौन सा वस्ल जाविदानी है
जिस्म से रूह आशना कब तक

मेरे बारे में सोचता नहीं जो
उसके बारे में सोचना कब तक

जैसे तूफ़ान जी रहा हूँ मैं
रात-दिन का ये ज़लज़ला कब तक

इश्क़ का ज़ौक़ भी ज़रूरी है
सिर्फ़ तल्ख़ी का ज़ायक़ा कब तक

पहले हँसता था अपनी हालत पर
हर उदासी पे क़हक़हा कब तक

ऐसे रिश्ते बचाते जाते हैं ?
सिर्फ बातों का हाशिया कब तक

इससे बेहतर है हम अलग हों जांय
बेतअल्लुक़ सा राबता कब तक


दिनेश नायडू

No comments:

Post a Comment