काम आयेगी ये दवा कब तक
आहटें सुन रहा था ख़लवत में
जाने फिर सोचता रहा कब तक
सर्द रातों का बर्फ़ सन्नाटा
ज़हन में गूंजता रहा कब तक
पास हो इसलिये तो पूछा है
दरमियाँ होगा फ़ासला कब तक
सिलवटें वक़्त की नज़र आयीं
देख पाता मैं आइना कब तक
कौन सा वस्ल जाविदानी है
जिस्म से रूह आशना कब तक
मेरे बारे में सोचता नहीं जो
उसके बारे में सोचना कब तक
जैसे तूफ़ान जी रहा हूँ मैं
रात-दिन का ये ज़लज़ला कब तक
इश्क़ का ज़ौक़ भी ज़रूरी है
सिर्फ़ तल्ख़ी का ज़ायक़ा कब तक
पहले हँसता था अपनी हालत पर
हर उदासी पे क़हक़हा कब तक
ऐसे रिश्ते बचाते जाते हैं ?
सिर्फ बातों का हाशिया कब तक
इससे बेहतर है हम अलग हों जांय
बेतअल्लुक़ सा राबता कब तक
दिनेश नायडू
No comments:
Post a Comment