बस इसी खोज मे लगा हूँ मैं
रोशनी क्यूँ नहीं मिली मुझको
एक मुद्दत से जल रहा हूँ मैं
अपनी राहों में बारहा बिछ कर
अपने ही पाँव में चुभा हूँ मैं
ज़िंदगी सिर्फ़ दर्द का दुहराव
फिर भी शिद्दत से जी रहा हूँ मैं
उसने ये भी कभी नहीं सोचा
क्यूँ उसे इतना सोचता हूँ मैं
दर्द गम टीस आह सन्नाटा
कितने हिस्सों में बँट गया हूँ मैं
तूने छू कर बदल दिया मुझको
आज जाना की और क्या हूँ मैं
दिनेश नायडू
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