कब से शादाब है, आबाद है सहरा मुझसे
अश्कबारी का कोई सीखे सलीक़ा मुझसे
मुझको रो लेने दो अब टूट के रो लेने दो
ज़ब्त का हो नहीं पायेगा दिखावा मुझसे
वक़्त भी मुझ पे अब इल्ज़ाम लगाने लगा है
तब न गुज़रेगा यहाँ एक भी लम्हा मुझसे
गूंज बन कर जो भटकती है दिवाने की सदा
कुछ न कुछ तो है उस आवाज़ का रिश्ता मुझसे
पहले तकता है मुझे मुद्दतों ख़ामोशी से
और फिर बोलने लगता है अँधेरा मुझसे
रौशनी होती रही, जलता रहा मैं, फिर क्यूँ ?
हो गया शब की उदासी में इज़ाफ़ा मुझसे
तुमको चाहा तो ये अहसास हुआ है मुझको
मुझमें रहता है कोई शख्स अलग सा मुझसे
‘रंग मुझमें भी है शायद कभी खिलता मैं भी
गर किसी रोज़ वो तस्वीर बनाता मुझसे
मेरी जानिब से तेरी ओर सदा नामुमकिन
मैं नहीं था ये कोई और पुकारा मुझसे
ज़िन्दगी छीन ले हाथों से मिरे तू पतवार
डूब जाये न कहीं तेरा सफ़ीना मुझसे
वो जो ताउम्र मिरे पास नहीं आ पाया
किसने सोचा था ख़लाओं में मिलेगा मुझसे
दिनेश नायडू
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