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Friday, April 17, 2020

लेकिन अभी भी आस लगाई हुई तो है


काली घटा नसीब पे छाई हुई तो है
यानी बहार ज़ख़्मों पे आई हुई तो है

ख़ाहिश है तुम ही दश्त में हमको करो तलाश
आवाज़ वैसे सबको लगाई हुई तो है

तन्हाइयों में शाम बितानी है आज फिर
सिगरट भी खैर हमने जलाई हुई तो है

क्यों कह रहे हैं आपको हम भूल भी गये
माज़ी की लाश हमने उठाई हुई तो है

वैसे तो अश्क अश्क गँवाया है जान को
लेकिन अभी भी आस लगाई हुई तो है

मुमकिन है अब की बार मिले हमको ज़िंदगी
रफ़्तार हमने अपनी बढ़ाई हुई तो है

मुमकिन है क़हक़हों का फ़ज़ाओं में रक़्स हो
आँखों से आँसुओं की विदाई हुई तो है

फिर भी तुम्हारे लम्स की दरकार है इसे
ये ज़ख़्मे-दिल है इसकी दवाई हुई तो है

दिनेश नायडू

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