यानी बहार ज़ख़्मों पे आई हुई तो है
ख़ाहिश है तुम ही दश्त में हमको करो तलाश
आवाज़ वैसे सबको लगाई हुई तो है
तन्हाइयों में शाम बितानी है आज फिर
सिगरट भी खैर हमने जलाई हुई तो है
क्यों कह रहे हैं आपको हम भूल भी गये
माज़ी की लाश हमने उठाई हुई तो है
वैसे तो अश्क अश्क गँवाया है जान को
लेकिन अभी भी आस लगाई हुई तो है
मुमकिन है अब की बार मिले हमको ज़िंदगी
रफ़्तार हमने अपनी बढ़ाई हुई तो है
मुमकिन है क़हक़हों का फ़ज़ाओं में रक़्स हो
आँखों से आँसुओं की विदाई हुई तो है
फिर भी तुम्हारे लम्स की दरकार है इसे
ये ज़ख़्मे-दिल है इसकी दवाई हुई तो है
दिनेश नायडू
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