तमाम शहर में सैलाब लाने वाला है
उसे बता दो जो दीपक जलाने वाला है
सियाह रात का हर एक रंग काला है
भले चमक तो रहा है अभी फ़लक पर वो
मगर ये शम्स किसी रात का निवाला है
वही है जिसने मुझे उम्र भर किया बर्बाद
वही है जिसने मुझे उम्र भर सम्भाला है
ये तेरी रौनक़ें हैं या है मेरा अंधापन
अँधेरा है कि तिरे शह्र में उजाला है
फ़ज़ा में कितनी नमी आ गयी है क्या बोलूं
उसे सम्भालो जो आंसू बहाने वाला है
गली में आ गया हूँ तेरी और बैठा हूँ
मेरे लिए यही मस्जिद यही शिवाला है
कई दिनों से मैं घर में बहुत अकेला हूँ
बस एक चाय है और एक ये रिसाला है
वो जो दिवाना सा लड़का था इश्क़ में पागल
अब उसने अपनी मुहब्बत को मार डाला है
नहीं है कोई जो इस घर की देख-भाल करे
है धूल फ़र्श पे दीवार पर भी जाला है
दिनेश नायडू
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