मैं किस दलदल में फंसता जा रहा हूँ
वो कब आवाज़ देगा रोकने को
मैं कब से रुकता-रुकता जा रहा हूँ
मुझे दरिया की तुगियानी से क्या है
मैं बादल हूँ बरसता जा रहा हूँ
मिरे पैरों के छाले रिस रहे हैं
न जाने कब से चलता जा रहा हूँ
वो दीवाना सा लड़का मर गया है
मगर फिर भी मैं हँसता जा रहा हूँ
सराबों में कोई चेहरा दिखा था
मैं सहरा में तड़पता जा रहा हूँ
ये पत्थर लाल क्यूँ होता नहीं है
मुसलसल सर पटकता जा रहा हूँ
हर इक कमरे में है इक और कमरा
मैं इस घर में भटकता जा रहा हूँ
तिरी क़ुर्बत का ऐसा रोग पाया
मैं अब खुद से ही कटता जा रहा हूँ
दिनेश नायडू
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