ख़ाबे-तामीर बिखर जाना है ?
हमको इस दश्त में जाना होगा
वहशतों का यही हरजाना है
साहिबो ! हम हैं उसी सफ़ के लोग
जिनसे सहरा को सँवर जाना है
सामने शह्र की हद है साहब
अब हमें लौट के घर जाना है
क़ब्रगाहें हैं सदाओं की यहां
बस यहीं हमको भी मर जाना है
कैसे कैसे मुझे आते हैं ख़याल
अब के लगता है कि मर जाना है
क्या है ये जी का डरा सा रहना
क्या ये अपने से मुकर जाना है
तुमको ख़ोने का तुम्हें पाने का
हमने हर क़िस्म का डर जाना है
कोई भी राह नहीं है उस तक़
हमको मालूम है पर जाना है
लो नज़र आने लगा उसका शह्र
क़ाफ़िले वालो ! ठहर जाना है
किस लिए तैरना अश्कों में सदा
अब तहे-दीदा-ए-तर जाना है
वो ‘दिनेश’ उसकी गली है आगे
देख़ लो तुमको किधर जाना है
दिनेश नायडू
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