कहाँ से मुझमें आ गयीं सदायें आबशार की
अँधेरे में बिखर गए सभी दिए निगाह के
बड़ी तवील रात थी तुम्हारे इंतज़ार की
न कोई आरज़ू, न कोई ख़ाब है, न जुस्तजू
किसी ने दिल के शहर में कुछ ऐसी लूटमार की
अभी तो सिर्फ दश्त की हवाएं रास आईं हैं
अभी तो इब्तिदा हुई है अपने इंतिशार की
कभी लगाईं थी तुम्हें पुकार मैंने टूट कर
भटक रही है वादियों में रूह उस पुकार की
वो आ गया मुंडेर पे न जाने आगे क्या हुआ
“ये दास्तान है नज़र पे रौशनी के वार की ”
दिनेश नायडू
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