तुम क्या जानो क्या क्या अच्छा लगता है
उनको नफ़रत है माज़ी की चर्चा से
हमको ग़ज़लें कहना अच्छा लगता है
घंटी बजते रहती है मोबाइल की
गुमसुम बैठे रहना अच्छा लगता है
सारी रातें तुमसे झगड़ा करने से
मुझको अब सो जाना अच्छा लगता है
तेरी चीज़ें रक्खी है अलमारी में
सो अब इस पर ताला अच्छा लगता है
अपनी ये तस्वीर भी ले जाओ मुझसे
सहरा में क्या दरिया अच्छा लगता है
अब तेरा ज़िंदा रहना मंज़ूर नहीं
ख़ाब मुझे तू मुर्दा अच्छा लगता है
मौक़ा हो तो भूखा उड़ जाये पंछी
क्या पिंजरे में दाना अच्छा लगता है
दिनेश नायडू
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