ऐ ख़ुदा ! इतनी मेहरबानी हो
ख़्वाब सी अपनी ज़िंदगानी हो
जिसका हर एक रंग धानी हो ,
ज़िन्दगी में कोई नहीं टोके,
सिर्फ ख़्वाबों की हुक्मरानी हो
ये जो धरती है इसपे तुम इंसान
एक ज़र्रा हो और फ़ानी हो
घर से रुख़सत हुई हर इक उम्मीद
क्यूँ न अब ग़म की मेज़बानी हो
क्या ही सूने रहे मिरे मंज़र
अब निगाहों को बदगुमानी हो
घर किसी तौर बच नहीं सकता
किसलिये इसकी पासबानी हो
मेरा किरदार भी बताओगी
ज़िन्दगी तुम अगर कहानी हो
और बर्बाद हो मिरी कश्ती
और मौजों में बेकरानी हो
बस तुम्हीं को नहीं हुआ मालूम
तुम मिरी जुस्तजू पुरानी हो
अपने उस्ताद से यही सीखा
जो भी तेवर हो ख़ानदानी हो
दिनेश नायडू
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