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Friday, April 17, 2020

मैं अपने दिल में तेरी याद का सैलाब रखता हूँ


मैं अपने दिल में तेरी याद का सैलाब रखता हूँ
और इस तलवार से पर्वत का सीना चीर सकता हूँ

कई फूलों से चेहरे आ गये मेरी इबादत में
निगाहों में बहारों का मैं वो एहसास रखता हूँ

तिरी आँखों की गहराई का अंदाज़ा न था मुझको
मगर ये शक़ तो था शायद कभी मैं डूब सकता हूँ

मुझे ख़ामोशियों में ज़िन्दगी जीनी पड़ेगी अब
मैं इस दरजा किसी भी बात को कहने से डरता हूँ

तुम अपने फ़ैसले को ठीक अब भी मानती हो क्या
मिरा क्या है कि मैं इस आग में हर रोज़ जलता हूँ

भरी है डायरी मेरी फ़क़त तेरी कहानी से
अक़ीदत से तिरी यादों को मैं हर रोज़ पढता हूँ

तिरी तस्वीर सीने से लगा रक्खी है, सिगरट है
यही वो ढंग है जिससे तुझे मैं दूर रखता हूँ

सदा मेरी मुझी तक आ नहीं पायी मगर जानां
न जाने क्यूँ मुझे लगता है मैं भी चीख़ सकता हूँ

किया जिसने भी अपनी ज़िन्दगी को आशिक़ी के नाम
मैं उस हर एक शायर की किताबों में महकता हूँ

मुझे रिश्तों के भोलेपन पे इस दरजा भरोसा है
कोई गर बात इनकी छेड़ दे तो चुप ही रहता हूँ

तेरी गलियों के चुम्बक से ये मेरे पाँव चिपके हैं
मुझे कैसे भरोसा हो कि हाँ मैं चल भी सकता हूँ

दिनेश नायडू

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