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Friday, April 17, 2020

मेरे अंदर है अंधेरा और बाहर चाँदनी


चाँद रातों का तो होती है मुक़द्दर चाँदनी
मेरी क़िस्मत में मगर आयी है पत्थर चाँदनी

मैं वो दीपक हूँ कि जलता ही रहेगा उम्र भर
मेरे अंदर है अंधेरा और बाहर चाँदनी

है ये मुमकिन रोशनी से आगे भी कुछ और हो
बुझ गया कल एक दीपक सिर्फ़ कह कर चाँदनी

मैं तिरी दहलीज़ पर कब से पड़ा हूँ बेसबब
क्यूँ नहीं बनती कभी मेरा मुक़द्दर चाँदनी

तूने क्यूँ दावा किया था रौशनी के नाम का
टिक गयी कितनी निगाहें तुझ पे आ कर चाँदनी

रात के आकाश पर लेटा हूँ महवे-ख़ाब मैं
चाँद है तकिया मिरा और मेरी चादर चाँदनी

क्या ज़रा भी रात की वीरनियाँ कम हो सकीं
फिर भी है उम्मीद का कोई समंदर चाँदनी

आपके आते ही जैसे सारा आलम खिल उठा
चाँद, तारे, फूल, शबनम, मौज, सागर, चाँदनी

चाँद का टुकड़ा मिरी आँखों में आ कर चुभ गया
और फिर बहने लगी आँखों से झर झर चाँदनी

क्या घटा ने चाँद को फिर ले लिया आग़ोश में
क्यूँ भला बैठी हो ऐसे मुँह फुला कर चाँदनी

दिनेश नायडू

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