सुना है अब वो रहा करता है ख़लाओं में
कहाँ से आती है आवाज़ सहमी सहमी सी
ये इक अज़ाब सा रहता है क्या हवाओं में
किसी का अक्स मिरे इर्द गिर्द रहता है
किसी की याद भटकती है इन फ़ज़ाओं में
तमाम शोर ख़मोशी में ढलता जाता है
हर एक टीस बदल जाती है सदाओं में
ज़रीया कौन है अश्कों के आने-जाने का
कहाँ से आयी नमी ज़ह्न की गुफाओं में
बिखर रहा हूँ मैं बारिश की सर्द बूंदों से
वो चाहता है तो मिल जाउंगा घटाओं में
गुज़रना होगा जुदाई के सर्द मौसम को
दबी है दूब कहीं बर्फ की रिदाओं में
हज़ार ज़ुल्म करें उफ़ नहीं करेंगे हम
हमारा नाम भी लिख लीजे बेसदाओं में
दिनेश नायडू
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