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Friday, April 17, 2020

कब से हम ज़ब्त की दीवार संभाले हुए हैं


आपके दर्द के दीनार संभाले हुए हैं
कुछ नहीं बाक़ी सो नाचार संभाले हुए हैं

ज़िंदगी इतना हमें पीछे नहीं छोड़ कि हम
भागते-दौड़ते रफ़्तार संभाले हुए हैं

अब न थम पायेगा आहों का ये दरिया हमसे
कब से हम ज़ब्त की दीवार संभाले हुए हैं

फ़त्ह मुमकिन है कि इन लोगों के हाथ आये कि ये
अब भी टूटी हुई तलवार संभाले हुए हैं

ये फ़क़ीरी भी अजब चीज़ है दुनिया वालो
हम नहीं कुछ भी प दरबार संभाले हुए हैं

धीरे-धीरे ही सही रास्ता तय होगा मिरा
आबले, राह के सब ख़ार संभाले हुए हैं

इक तिरे ग़म से तसल्ली नहीं होती इसकी
ज़ह्न ने सैकड़ों आज़ार संभाले हुए हैं


दिनेश नायडू

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