और फिर धूप में नहाये हम
प्यास से कितना छ्टपटाये हम
फिर भी सहरा में जगमगाये हम
आपका ज़िक्र था कहीं कल रात
एक कोयल से गुनगुनाये हम
सब पे तनक़ीद की कि बदलें आप
अपनी आदत बदल न पाये हम
सारी दुनिया का इल्म ढूँढते थे
क्या कभी ख़ुद को जान पाये हम
रास आये नहीं ज़माने को
सिर्फ़ तन्हाइयों को भाये हम
आप ने भी कभी नहीं सोचा
कैसे दीवानगी तक आये हम
ज़िंदगी आजकल ये लगता है
जिस्म में किसलिये समाये हम
दिनेश नायडू
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