रम गए ग़म में अनासिर मेरे
ख़ून फिर टपका मिरी आँखों से
बन गए अश्क जवाहिर मेरे
मैं हूँ सूना सा मुसाफ़िरख़ाना
दूर बैठे हैं मुसाफ़िर मेरे
मेरी क़िस्मत में खिज़ाँ लिखते वक़्त
हाथ कांपा न मुहर्रिर मेरे
मेरी सूरत को मुकम्मल पा कर
कितने हैरां हैं मुसव्विर मेरे
आजकल सिर्फ़ ख़ला है मुझमें
मेरे बाहर हैं अनासिर मेरे
तू मिरे पास अगर है जानां
सूने फिर क्यों हैं मनाज़िर मेरे
वहशतें मेरी …. इबादत यानी
मेरे अन्दर ही हैं मंदिर मेरे
दिनेश नायडू
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