शायरी तेरा हो रहा हूँ मैं
घाटियों से निकल के पर्वत की
बाँध के पाँव धो रहा हूँ मैं
काट दी उम्र ध्यान में तेरे
सबने सोचा कि सो रहा हूँ मैं
जीत ली है नदी की तुगियानी
अब सफ़ीने डुबो रहा हूँ मैं
कितनी शिद्दत से गम के बीजों को
अपने सीने में बो रहा हूँ मैं
ज़िंदगी अब मुझे इजाज़त दे
कब से साँसों को ढो रहा हूँ मैं
धूप निकली है और कुहरा है
कैसे मौसम का हो रहा हूँ मैं
एक आवारा मस्त बादल हूँ
सारी दुनिया भिगो रहा हूँ मैं
अब मुझे शून्य में नहीं जीना
तुझको खुद में समो रहा हूँ मैं
दिनेश नायडू
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