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Friday, April 17, 2020

बेकरानी में खो रहा हूँ मैं


बेकरानी में खो रहा हूँ मैं
शायरी तेरा हो रहा हूँ मैं

घाटियों से निकल के पर्वत की
बाँध के पाँव धो रहा हूँ मैं

काट दी उम्र ध्यान में तेरे
सबने सोचा कि सो रहा हूँ मैं

जीत ली है नदी की तुगियानी
अब सफ़ीने डुबो रहा हूँ मैं

कितनी शिद्दत से गम के बीजों को
अपने सीने में बो रहा हूँ मैं

ज़िंदगी अब मुझे इजाज़त दे
कब से साँसों को ढो रहा हूँ मैं

धूप निकली है और कुहरा है
कैसे मौसम का हो रहा हूँ मैं

एक आवारा मस्त बादल हूँ
सारी दुनिया भिगो रहा हूँ मैं

अब मुझे शून्य में नहीं जीना
तुझको खुद में समो रहा हूँ मैं


दिनेश नायडू

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