ज़िन्दगी मुझको आज़माती है
जिस्म है एक रेलवे स्टेशन
सांस आती है सांस जाती है
मेरी आँखों में आपका चेहरा
चांदनी झील में नहाती है
कोई दरिया नहीं है सहरा में
रेत सहरा में जगमगाती है
कितनी नाज़ुक है डोर रिश्ते की
एक झटके में टूट जाती है
मैंने कुछ भी नहीं लिखा खुद से
शायरी ! शायरी लिखाती है
मैं तो हर ग़म छुपा के रखता हूं
जाने कैसे वो जान जाती है
इक सरापा बयान करना था
और तहरीर थरथराती है
दिनेश नायडू
No comments:
Post a Comment