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Friday, April 17, 2020

आग भी किसका भला चाहती है ?


इश्क़ की शम्म बुझा चाहती है
शायरी तेज़ हुआ चाहती है

मैं भी हर ख्वाब भुला बैठा हूँ
वो भी अब ख्वाब नया चाहती है

सबको होना है मुहब्बत में ख़ाक
आग भी किसका भला चाहती है

तेरी उम्मीद अभी तक मुझमें
सारे पेड़ों को हरा चाहती है

क्यूँ मुहब्बत में मिलन का हो ज़िक्र
क्या नदी बाँध बना चाहती है

पर्वतों तुमने ही रस्ता रोका
लौटना कौन सदा चाहती है

सारे रिश्तों से अलग कर डाला
जाने क्या मेरी अना चाहती है

आज तक बुनती है स्वेटर नानी
शह्र भी गाँव ही सा चाहती है


दिनेश नायडू

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