ताउम्र मैने किसलिये ये ज़िंदगी सही
सहना था मुझको ग़म तिरा सो ग़म तिरा सहा
सहनी थी मुझको ज़िंदगी सो ज़िंदगी सही
रह रह के डूब जाता हूँ तेरे ख़याल में
लगने लगी है अब तो मुझे ख़ुदकुशी सही
कल रात इक चराग़ यही कह के बुझ गया
ने तीरगी सही है न ही रौशनी सही
हंगामे से जहान के मैं जा रहा हूँ दूर
चाहे ये एक उम्र का वनवास ही सही
बेचैन हो गयी न मेरी शायरी से तुम
यानी की कह रही है मिरी शायरी सही
जब भी मिली हो कोई नया झूठ कह दिया
क्या कुछ मुझे बताओगी जानां सही सही
कैसे गुज़ार पाउँगा तेरे बिना ये उम्र
मुश्किल से काट पाया हूँ दिन बीस तीस ही
दिनेश नायडू
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