तुम भी मेरे जैसे हो
.
मुझको अपना कहते हो
मुझको अपना माने हो ?
.
मैं पर्वत सा ठहरा हूँ
तुम दरिया सा बहते हो
.
मेरी बातें चुभती है ?
तो क्या अब भी मेरे हो
.
क्या ख़ालीपन है तुम बिन
जैसे हर दिन सन्डे हो
.
सर्दी की ये तन्हा शाम
कैसे काटा करते हो
.
“ठंडी हो जायेगी चाय “
अब ये किस से कहते हो
.
सुलगा लेता हूँ सिगरेट
जब तुम याद आ जाते हो
.
मैं तो गुमसुम रहता हूँ
तुम क्यूँ मुझमें खोये हो
.
मेरी आह नहीं सुनते
क्या तुम बिल्कुल बहरे हो ?
.
मेरे सपने कम थे क्या
तुम भी सपने लाये हो
.
ये बतलाओ सन्नाटो !
मुझसे तुम क्यूँ जलते हो
.
ख़त में ये धब्बे कैसे
यानी तुम भी रोते हो !
.
मैं शायर सपनों का हूँ
और तुम मेरे सपने हो
.
दिनेश नायडू
No comments:
Post a Comment