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Friday, April 17, 2020

वो नर्मरौ है नदी का मगर ठिकाना क्या


सदा लगाता रहेगा ये ताज़ियाना… क्या ?
चलो दिखायें ज़माने को है दिवाना क्या

वो ज़िन्दगी तो न थी सिर्फ़ एक लम्हा थी
उसी के ध्यान में दिन रात डूब जाना क्या

कभी कभी मैं खुले दिल से रो भी लेता हूँ
उदासियों में भला सिर्फ़ मुस्कुराना क्या

उदास शाम है, ग़म का वही फ़साना है
हुई है फिर से फ़ज़ा मेरी शायराना क्या

ये जगमगाते हैं इनको छुपाऊँ कैसे ? कहाँ ?
तिरे ख़तों को पड़ेगा मुझे जलाना क्या

भटकता फिरता हूँ मुद्दत से अपने अंदर मैं
नहीं मिलेगा मुझे कोई आशियाना क्या

तमाम उम्र सिमटता रहा हूँ मैं खुद में
मैं अपनी ज़ात में हूँ अपना क़ैदख़ाना क्या

यही तो सोच के पास आये हैं सराबों के
हसीन प्यास है इतनी इसे बुझाना क्या

सुनो हवाओ चरागों को छोड़ दो तनहा
जो जल रहे हैं उन्हें और आज़माना क्या

कभी न छायेंगे मौसम पे अब हमारे रंग
कभी न लौट के आयेगा वो ज़माना क्या

किया है जमअ तेरी यादों को अक़ीदत से
भला जहाँ में कोई और है ख़ज़ाना क्या

मुझे यक़ीन है आँखों से फूट आयेगी
वो नर्मरौ है नदी का मगर ठिकाना क्या

भला ये कौन दबी आहटों से आता है
शुरू हुआ है तेरा फिर से आना जाना क्या

तुम्हारी याद क्यूँ बैठी है मुंह फुलाये हुए
नहीं हुई है मिरी बेख़ुदी रवाना क्या

दिनेश नायडू

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