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Friday, April 17, 2020

कोई भी खाब अपना कभी नींद भर न था


जब शह्र में कोई भी मिरा अपना घर न था
हाँ था मगर मैं इतना कभी दर-ब-दर न था

लड़ता रहा मैं आख़िरी दम तक अंधेरे से
लेकिन निगाह में कभी खाबे-सहर न था

यूँ तो हजारों लोग मिले मुझको राह में
उस हमसफ़र सा और कोई हमसफ़र न था

उसके बस एक लम्स से शायर हुआ हूँ मैं
सच कह रहा हूँ मुझमें कोई भी हुनर न था

कोई भी नींद अपनी कभी खाब भर न थी
कोई भी खाब अपना कभी नींद भर न था

जो फ़ैसला नही लिया, वो ख्वाब था मेरा !
जो फ़ैसला हुआ है वो मद्दे-नज़र न था

मुझको किसी निगाह ने बख्शे हज़ार गुल
सहरा में वैसे हद्दे-नज़र तक शजर न था

बुज़दिल बना दिया है तिरे प्यार ने मुझे
मुझको किसी भी बात का कोई भी डर न था

जब दिल किया तो मैने सफीने डुबो दिए
दरिया तो शांत था कहीं उसमें भंवर न था

दिनेश नायडू

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