शहर में गुमरही तो होनी थी
मुझसे आवारगी तो होनी थी
मुझसे आवारगी तो होनी थी
ख़ाब जैसा था तेरा साथ मगर
एक दिन ज़िंदगी तो होनी थी
मेरा सावन कभी नहीं जाता
मुझसे ज़ाहिर नदी तो होनी थी
कितनी बेहिस थी वो बरहना झील
डूब कर सनसनी तो होनी थी
तुमसे टकरा गई मेरी यादें
फूल सी शायरी तो होनी थी
वो भी तन्हा था मैं भी तन्हा था
दोस्तो! दोस्ती तो होनी थी
कोई हैरत नहीं कि खुशियों में
दिल को तेरी कमी तो होनी थी
माहे-कामिल था रात आँखों में
ये ग़ज़ल आपकी तो होनी थी
चार दिन उम्र इश्क़ की थी 'दिनेश'
चार दिन चाँदनी तो होनी थी
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