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Saturday, July 12, 2025

एक दिन ज़िंदगी तो होनी थी

शहर में गुमरही तो होनी थी
मुझसे आवारगी तो होनी थी 

ख़ाब जैसा था तेरा साथ मगर 
एक दिन ज़िंदगी तो होनी थी 

मेरा सावन कभी नहीं जाता 
मुझसे ज़ाहिर नदी तो होनी थी 

कितनी बेहिस थी वो बरहना झील 
डूब कर सनसनी तो होनी थी

तुमसे टकरा गई मेरी यादें 
फूल सी शायरी तो होनी थी

वो भी तन्हा था मैं भी तन्हा था
दोस्तो! दोस्ती तो होनी थी 

कोई हैरत नहीं कि खुशियों में 
दिल को तेरी कमी तो होनी थी 

माहे-कामिल था रात आँखों में
ये ग़ज़ल आपकी तो होनी थी 

चार दिन उम्र इश्क़ की थी 'दिनेश'
चार दिन चाँदनी तो होनी थी

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