एक चुभती धूप को महताब जैसा कर दिया
उसने मेरी ज़िन्दगी को ख़ाब जैसा कर दिया
उसने मेरी ज़िन्दगी को ख़ाब जैसा कर दिया
अंदर अंदर घुल रही है रफ़्ता रफ़्ता ज़िन्दगी
ग़म ने मेरे अश्कों को तेज़ाब जैसा कर दिया
कितने लोगों को बचा पाता मैं ऐसी बाढ़ में
मैंने अपनी नाव को ग़र्क़ाब जैसा कर दिया
आ गए आयाम कितने ही नए अशआर में
सिर्फ मिसरों में कहीं ऐराब जैसा कर दिया
कितना सूना लग रहा था पानियों का सिलसिला
मैंने पत्थर फेंक कर गिर्दाब जैसा कर दिया
उसने कुछ बोला नहीं ऐसे तो मुझको देख कर
उसकी आँखों ने मगर आदाब जैसा कर दिया
हर क़दम रखने से पहले सोचता हूँ ठहर के
मुझ नदी को उसने इक तालाब जैसा कर दिया
अब पड़ा रहता हूँ ख़ुद में बंद इस घर में कहीं
यूँ मुझे घर वालों ने अस्बाब जैसा कर दिया
जिस्म के सहरा में उसको ढूंढता फिरता हूँ मैं
जिसने मेरी ख़ाक को गिर्दाब जैसा कर दिया
नर्म रौ दरिया के जैसा बह रहा था मैं दिनेश
एक ही ठहराव ने सैलाब जैसा कर दिया
दिनेश नायडू
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