हमने जुनूँ में साहिबो जो भी कहा कहा
उसकी ग़ज़ाल आँखों में बस देखते रहे
ये सुध कहाँ थी हमको भला उसने क्या कहा
मैं छटपटा रहा था कि नद्दी थी तेज़ धार
लोगों ने डूबने को मेरे तैरना कहा
कल शाम हमने अपनी उदासी के सामने
अपने दिले ख़राब पर इक मर्सिया कहा
सुन ही नहीं सका मेरी खामोशियों की चीख़
उसने तमाम उम्र मुझे बेसदा कहा
कल रात अपने चाँद की तस्वीर खींच दी
तारों ने आ ज़मीँ प मुझे शुक्रिया कहा
उसकी निगाहे नाज़ कभी मिल नहीं सकी
हर बार उसके रम्ज़ ने मुझको बुरा कहा
पूछा मुझे जहान ने जब हासिले हयात
मैंने तुम्हारा नाम मेरी दिलरुबा कहा
हर बार की तरह न थी इस बार वो निगाह
इस बार उस निगाह ने कुछ अनकहा कहा
मेयार तेरा बज़्म में यूँ ही बना रहे
अच्छा हुआ जो तूने मुझे बेवफ़ा कहा
हम थे उदासियों का सिरा ढूँढ़ते रहे
दुनिया ने बार बार हमें जां बचा कहा
दिनेश नायडू
No comments:
Post a Comment