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Friday, January 17, 2025

लोगों ने डूबने को मेरे तैरना कहा

कुछ ने ग़ज़ल सराही किसी ने बुरा कहा 
हमने जुनूँ में साहिबो जो भी कहा कहा 

उसकी ग़ज़ाल आँखों में बस देखते रहे 
ये सुध कहाँ थी हमको भला उसने क्या कहा

मैं छटपटा रहा था कि नद्दी थी तेज़ धार
लोगों ने डूबने को मेरे तैरना कहा

कल शाम हमने अपनी उदासी के सामने 
अपने दिले ख़राब पर इक मर्सिया कहा

सुन ही नहीं सका मेरी खामोशियों की चीख़
उसने तमाम उम्र मुझे बेसदा कहा

कल रात अपने चाँद की तस्वीर खींच दी
तारों ने आ ज़मीँ प मुझे शुक्रिया कहा

उसकी निगाहे नाज़ कभी मिल नहीं सकी
हर बार उसके रम्ज़ ने मुझको बुरा कहा

पूछा मुझे जहान ने जब हासिले हयात
मैंने तुम्हारा नाम मेरी दिलरुबा कहा

हर बार की तरह न थी इस बार वो निगाह
इस बार उस निगाह ने कुछ अनकहा कहा

मेयार तेरा बज़्म में यूँ ही बना रहे 
अच्छा हुआ जो तूने मुझे बेवफ़ा कहा

हम थे उदासियों का सिरा ढूँढ़ते रहे 
दुनिया ने बार बार हमें जां बचा कहा 

दिनेश नायडू

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