कई युगों से ये आते जाते हुए मनाज़िर बने हुए हैं,
अजीब हलचल मची हुई है, कई युगों से
खामोशियों में वही पुराना सा शोर पानी का उठ रहा है
ये पानियों का जो सिलसिला है, यही ख़ला है,
तमाम मंज़र इसी में कब से सिमट रहे हैं,
वो दूर सूरज भी थक के इसमें उतर रहा हैं
न जाने कितने युगों से मैं भी समन्दरों में भटक रहा हूँ
हवाएं सीली हवाएं मुझमें उतर चुकी हैं
वो साहिलों के हसीन सपने मुझे हंसा के गुज़र चुके हैं
न जाने कब से मैं बुलबुलों सा समन्दरों में बिखरता बनता ही जी रहा हूँ
मैं ज़िन्दगी का हरेक लम्हा समन्दरों में डूबा चूका हूँ !
दिनेश नायडू
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