कोई चेहरा ज़हन में आता रहा
रात मेरे सामने बैठी रही
मैं उसे इक ख़ाब दिखलाता रहा
चहचहाती आ गयी फिर से सहर
ख़ाब भी कल रात का जाता रहा
इक नदी बहती रही मद्धम कहीं
साथ में मल्लाह इक गाता रहा
नज़्म सी लगने लगी थी शाम भी
इक ख़याल आता रहा जाता रहा
कोई मिसरा शेर बन पाये, सो मैं
सिगरटें रह रह के सुलगाता रहा
जो कहानी में न गूंथा जा सके
मेरा उस किरदार से नाता रहा
दिनेश नायडू
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